حينما تقتحمين مُخيّلتي

عبد الخضر الامارة
حينما تقتحمين مُخيّلتي
نصف هياماتي
لك ِ
ونصفها لشفتيك ِ..
اليانعتين
……. .
حينما تقتحمين مخيلتي..
أُحلق ُ في
هذياناتي
وأستلقي على..
عروشك ِ ألصاخبة
……..
في لحظة ِ عشقي لك ِ
سرقت ُ كل ما فيك ِ
لون عينيك ِ..
إبتسامتك ِ
شفاهك ِ المتوردة
حتى تلك الفكرة..
المجنونة
…….
دعيني أطارحك ِ الغرام
شتائية الليل.. ودفء المواقد
ألآيلة للخفوت..
تحملني إلى..
أحضانك ِ ألحارقة
…….
غمرتني بماء ِ شفتيها
ذات قيض..
فجاءتْ البلابل ُ..
تطلبُ ريقها..
مني
……..
أنت ِ..
إفلاطونية ألعشق ِ
فرويدية ألاشتهاء
أنت ِ أمرأة
من فواكه طازجة ٍ
ناعمة.. وملمسها
يغريني
( عبد الخضر سلمان الامارة.. العراق)

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